पत्नी को पीटने की छूट, 'सोडोमी' पर मौत की सजा! तालिबान के नए आदेश ने दुनिया को क्यों चौंका दिया?
अफगानिस्तान में तालिबान सरकार द्वारा जारी एक नए आदेश ने एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मानवाधिकार, महिलाओं की सुरक्षा और न्याय व्यवस्था को लेकर गंभीर बहस छेड़ दी है। इस आदेश में कथित तौर पर कुछ ऐसे प्रावधान शामिल हैं, जिनमें पुरुषों द्वारा पत्नी के साथ हिंसा की सीमित अनुमति, कुछ अपराधों के लिए मौत की सजा और विभिन्न सामाजिक व्यवहारों के लिए कठोर दंड का उल्लेख किया गया है।
मानवाधिकार संगठनों का कहना है कि इस प्रकार के नियम महिलाओं और कमजोर वर्गों की सुरक्षा को और अधिक प्रभावित कर सकते हैं। वहीं तालिबान का दावा है कि उसके सभी कानून इस्लामी शरिया की उसकी व्याख्या पर आधारित हैं।
क्या है नया आदेश?
रिपोर्टों के अनुसार, तालिबान अधिकारियों द्वारा जारी इस नियम-संहिता में कथित तौर पर कहा गया है कि यदि कोई पुरुष अपनी पत्नी के साथ मारपीट करता है लेकिन उसकी हड्डी नहीं टूटती, शरीर पर गंभीर घाव नहीं बनते या स्पष्ट गहरे निशान नहीं पड़ते, तो उसे गंभीर अपराध की श्रेणी में नहीं माना जाएगा। हालांकि यदि चोट इतनी गंभीर हो कि हड्डी टूट जाए, खुला घाव बन जाए या स्पष्ट चोट के निशान दिखाई दें और पीड़िता अदालत में शिकायत करे, तो संबंधित व्यक्ति को दंडित किया जा सकता है।
इसी दस्तावेज़ में पुरुष-पुरुष यौन संबंध (सोडोमी) जैसे अपराधों के लिए अत्यंत कठोर दंड, जिसमें मृत्युदंड का भी प्रावधान बताया गया है, का उल्लेख किया गया है।
इन प्रावधानों ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया है।
दस्तावेज़ कैसे सामने आया?
बताया जा रहा है कि यह आदेश पिछले महीने जारी किया गया था, लेकिन हाल के दिनों में इसकी सामग्री अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बनी।
रिपोर्टों के अनुसार यह दस्तावेज़ अफगान मानवाधिकार संगठन रवादारी को लीक हुआ। संगठन ने इसे मूल पश्तो भाषा में प्रकाशित किया। बाद में Afghanistan Analysts Network ने इसका अंग्रेज़ी अनुवाद जारी किया, जिसके बाद इसके विभिन्न प्रावधान वैश्विक मीडिया में चर्चा का विषय बन गए।
हालांकि स्वतंत्र रूप से इस दस्तावेज़ के प्रत्येक प्रावधान का सत्यापन सभी अंतरराष्ट्रीय स्रोतों द्वारा समान रूप से नहीं किया गया है।
मानवाधिकार कार्यकर्ताओं की चिंता
मानवाधिकार संगठनों का कहना है कि इस प्रकार के नियम महिलाओं के लिए न्याय तक पहुंच को और कठिन बना सकते हैं।
काबुल की मानवाधिकार कार्यकर्ता महबूबा सेराज ने अंतरराष्ट्रीय मीडिया से बातचीत में कहा कि अफगानिस्तान में महिलाओं की स्थिति लगातार कठिन होती जा रही है। उनके अनुसार यदि घरेलू हिंसा को सीमित रूप में स्वीकार्यता मिलती है तो पीड़ित महिलाओं के लिए न्याय पाना और भी मुश्किल हो सकता है।
महिला अधिकार समूहों का कहना है कि पिछले कुछ वर्षों में महिलाओं की शिक्षा, रोजगार, सार्वजनिक जीवन में भागीदारी और व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर पहले ही कई प्रतिबंध लगाए जा चुके हैं।
तालिबान का क्या कहना है?
तालिबान लगातार यह कहता रहा है कि उसके सभी कानून इस्लामी शरिया के अनुसार बनाए जाते हैं।
तालिबान प्रशासन का दावा है कि उसकी न्याय व्यवस्था धार्मिक सिद्धांतों पर आधारित है और वही अफगान समाज के लिए उचित है।
हालांकि विभिन्न मुस्लिम देशों में शरिया कानून की अलग-अलग व्याख्याएं और उनका अलग-अलग तरीके से अनुपालन किया जाता है। इसलिए तालिबान की व्याख्या को सभी इस्लामी विद्वानों या मुस्लिम देशों का सर्वसम्मत दृष्टिकोण नहीं माना जाता।
पत्नी के साथ हिंसा पर क्या लिखा गया है?
रिपोर्टों में प्रकाशित अनुवाद के अनुसार यदि कोई पति अपनी पत्नी को इस हद तक मारता है कि—
हड्डी टूट जाए,
खुला घाव हो जाए,
या स्पष्ट गंभीर चोट के निशान पड़ जाएं,
और पीड़िता न्यायाधीश के समक्ष शिकायत दर्ज कराती है, तो संबंधित व्यक्ति को दोषी माना जा सकता है।
बताया गया है कि ऐसे मामलों में न्यायाधीश द्वारा 15 दिन तक की जेल की सजा दी जा सकती है।
मानवाधिकार विशेषज्ञों का कहना है कि इस प्रकार का प्रावधान घरेलू हिंसा को रोकने के बजाय उसे सीमित रूप में स्वीकार करने जैसा संदेश दे सकता है।
जानवरों से जुड़े मामलों में अधिक सख्त सजा?
दस्तावेज़ के अनुसार कुत्तों या मुर्गों जैसे जानवरों को लड़ाने वाले लोगों के लिए पांच महीने तक की जेल का प्रावधान बताया गया है।
इसी बिंदु को लेकर कई मानवाधिकार संगठनों ने सवाल उठाए हैं कि यदि रिपोर्टों में बताए गए प्रावधान सही हैं, तो घरेलू हिंसा की तुलना में पशु क्रूरता के मामले में अधिक कठोर दंड का प्रावधान दिखाई देता है।
हालांकि इस पूरे दस्तावेज़ की व्याख्या और कानूनी क्रियान्वयन को लेकर अभी भी विशेषज्ञों के बीच चर्चा जारी है।
2021 के बाद लगातार बदलते रहे हैं नियम
अगस्त 2021 में अमेरिका और नाटो सेनाओं की वापसी के बाद तालिबान ने दोबारा अफगानिस्तान की सत्ता संभाली थी।
इसके बाद से महिलाओं की शिक्षा, विश्वविद्यालयों में प्रवेश, कई सरकारी नौकरियों, सार्वजनिक स्थलों और सामाजिक गतिविधियों पर अनेक प्रतिबंध लगाए गए।
संयुक्त राष्ट्र, यूरोपीय संघ और कई अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों ने इन फैसलों पर लगातार चिंता जताई है और महिलाओं के अधिकारों की बहाली की मांग की है।
अंतरराष्ट्रीय समुदाय की प्रतिक्रिया
संयुक्त राष्ट्र सहित कई अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं पहले भी अफगानिस्तान में महिलाओं और लड़कियों के अधिकारों को लेकर चिंता व्यक्त कर चुकी हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि ऐसे नियमों को व्यापक रूप से लागू किया जाता है तो इससे अफगानिस्तान पर अंतरराष्ट्रीय दबाव और बढ़ सकता है।
मानवाधिकार संगठनों का कहना है कि किसी भी समाज में घरेलू हिंसा, लैंगिक भेदभाव और कठोर दंड व्यवस्था जैसे मुद्दों पर अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार मानकों का पालन किया जाना आवश्यक है।
शरिया कानून को लेकर अलग-अलग व्याख्याएं
यह समझना भी महत्वपूर्ण है कि शरिया कानून की व्याख्या सभी मुस्लिम देशों में समान नहीं है।
कई इस्लामी देशों में महिलाओं को शिक्षा, रोजगार, न्याय और सार्वजनिक जीवन में व्यापक अधिकार प्राप्त हैं, जबकि कुछ देशों में अपेक्षाकृत अधिक प्रतिबंधात्मक व्यवस्थाएं लागू हैं।
इसलिए तालिबान द्वारा लागू किए गए नियमों को पूरे इस्लाम या सभी मुस्लिम समाजों का प्रतिनिधि दृष्टिकोण नहीं माना जा सकता।
विशेषज्ञ क्या कहते हैं?
कानूनी और मानवाधिकार विशेषज्ञों का कहना है कि किसी भी देश की न्याय व्यवस्था में महिलाओं और पुरुषों दोनों के लिए समान कानूनी संरक्षण होना चाहिए।
घरेलू हिंसा, यौन अपराध और मानवाधिकार उल्लंघन जैसे मामलों में स्पष्ट, निष्पक्ष और प्रभावी कानून लोकतांत्रिक एवं न्यायसंगत समाज की बुनियादी आवश्यकता माने जाते हैं।
अफगानिस्तान में तालिबान द्वारा जारी कथित नई नियम-संहिता ने एक बार फिर दुनिया का ध्यान वहां की मानवाधिकार स्थिति की ओर खींचा है। दस्तावेज़ में वर्णित प्रावधानों को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर गंभीर चिंताएं व्यक्त की जा रही हैं, जबकि तालिबान इन्हें अपनी शरिया आधारित कानूनी व्यवस्था का हिस्सा बताता है। आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि इन नियमों का व्यवहारिक रूप से किस प्रकार अनुपालन होता है और अंतरराष्ट्रीय समुदाय इस पर क्या रुख अपनाता है।

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